कहानी
कहानी दो किरदारों- रोशनी श्रीवास्तव (मृणाल ठाकुर) और शशांक शर्मा (सिद्धांत चतुर्वेदी) पर केंद्रित है. शशांक एक सफल कॉर्पोरेट फर्म में काम करता है और उसके पास सब कुछ है- करियर, पैसा और भविष्य के प्लान. लेकिन, उसकी पर्सनैलिटी में एक कमी है, वह हकलाने से परेशान है. कॉर्पोरेट दुनिया के प्रेजेंटेशन-ड्रिवन कल्चर में यह अधूरापन उसे कमतर महसूस कराता है. दूसरी तरफ रोशनी है, जो एक जानी-मानी मीडिया एजेंसी में काम करती है. वह मॉडर्न और इंडिपेंडेंट है, लेकिन अपने लुक्स और बॉडी इमेज को लेकर उसे गहरी इनसिक्योरिटी महसूस होती है. उसे लगता है कि अगर वह परफेक्ट नहीं दिखेगी, तो दुनिया उसे रिजेक्ट कर देगी. उसका परिवार चाहता है कि वे शादी कर लें, लेकिन ये यंग लोग दुनिया से अपनी कमियां छिपाने की कोशिश में करीब आने से कतराते हैं. फिल्म का मेन कॉन्फ्लिक्ट अंदर का है, बाहर का नहीं.
एक्टिंग
‘गली बॉय’ में शेर और ‘गहरीयां’ में कॉम्प्लेक्स लवर का रोल करने के बाद, सिद्धांत ने यहां अपना बिल्कुल अलग साइड दिखाया है. उन्होंने एक हकलाने वाले इंसान के अंदर के स्ट्रगल को बिना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया है. उनकी आंखों में झिझक और बोलने से पहले का डर बहुत गहरा है. सिद्धांत ने साबित कर दिया है कि वह चुपचाप भी एक्टिंग कर सकते हैं. वहीं, मृणाल आज के समय की सबसे दमदार एक्ट्रेस में से एक हैं. ‘रोशनी’ के तौर पर, उन्होंने एक ऐसी औरत के इमोशंस को जिया है जो दुनिया के सामने कॉन्फिडेंट होने का दिखावा करती है, लेकिन जब वह खुद को आईने में देखती है, तो टूट जाती है. मृणाल की परफॉर्मेंस इतनी नेचुरल है कि हर दूसरी लड़की उनके कैरेक्टर से रिलेट कर पाएगी. को-स्टार की बात करें तो इला अरुण फिल्म में ठंडी हवा की तरह हैं. उनकी मौजूदगी वह ट्रेडिशनल गर्मजोशी और जुड़ाव लाती है जिसकी आज की जेनरेशन को तलाश है. संदीपा धर ने छोटे लेकिन अहम रोल में अपनी छाप छोड़ी है.
रवि उदयवार का डायरेक्शन फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है. वह मुंबई की भागदौड़ और कुमाऊं (उत्तराखंड) की शांत घाटियों के बीच एक परफेक्ट विजुअल बैलेंस बनाते हैं. जब फिल्म उत्तराखंड के पहाड़ों पर पहुंचती है, तो कैमरा और रंग बदल जाते हैं. कुमाऊं के सीन न सिर्फ खूबसूरत हैं, बल्कि वे किरदारों के मन की पवित्रता को भी दिखाते हैं.
डायलॉग और म्यूजिक
फिल्म के डायलॉग भारी-भरकम नहीं हैं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाली बातचीत जैसे हैं. यह नेचुरलनेस दर्शकों को किरदारों के करीब लाती है. म्यूजिक फिल्म के मूड के साथ तालमेल बिठाता है. गाने कहानी की रफ्तार में रुकावट नहीं डालते, बल्कि उसे आगे बढ़ाते हैं. ‘दो दीवाने शहर में’ का बैकग्राउंड स्कोर शहरी अकेलेपन और पहाड़ी आराम के बीच के अंतर को बहुत अच्छे से दिखाता है.
कमियां
अपनी सेंसिटिविटी के बावजूद, फिल्म ‘दो दीवाने शहर में’ कुछ मामलों में कमजोर पड़ जाती है. सबसे बड़ी कमी इसकी धीमी रफ्तार है, जिससे कहानी दूसरे हाफ में थोड़ी बोझिल लगती है. फिल्म एक ही इमोशनल टकराव को बार-बार दोहराती है, जिससे नयापन कम हो जाता है. इसके अलावा, स्क्रीनप्ले काफी हद तक अंदाजा लगाया जा सकता है- दर्शकों को एंडिंग के बारे में पहले से पता होता है, जिससे कोई बड़ा सरप्राइज नहीं होता. हकलाना और बॉडी शेमिंग जैसे गंभीर मुद्दे उठाए गए हैं, लेकिन कुछ सीन में सिद्धांत का हकलाना बहुत फिल्मी और ऊपरी लगता है, जो असल जिंदगी की मुश्किलों से बिल्कुल अलग है.
अंतिम फैसला
‘दो दीवाने शहर में’ उन लोगों के लिए जरूर देखने लायक है जो अपनी इनसिक्योरिटी से जूझ रहे हैं. यह हमें याद दिलाती है कि हमारी कमियां ही हमें इंसान बनाती हैं. अगर आप एक ऐसी लव स्टोरी देखना चाहते हैं जो शरीर से ज्यादा रूह से बात करे और जिसमें ग्लैमर से ज्यादा ईमानदारी हो, तो यह फिल्म आपके लिए है. यह एक मरहम की तरह है, जो आपको तेज रफ्तार जिंदगी के बीच रुकने, सांस लेने और खुद से प्यार करने का मौका देता है. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 3 स्टार.
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