क्या ये विवाद सच में अनजाने में होते हैं, या यह मार्केटिंग बजट में करोड़ों रुपये बचाने का एक स्मार्ट तरीका है?
अटेंशन इकोनॉमी
हम अटेंशन इकोनॉमी के जमाने में रहते हैं, जहां किसी का ध्यान खींचना सबसे बड़ी दौलत है. आज एक औसत फिल्म का प्रमोशन बजट 15 से 30 करोड़ रुपये तक होता है. लेकिन, अगर किसी फिल्म का नाम या कोई सीन विवाद खड़ा कर दे, तो लाखों लोग सोशल मीडिया पर उस पर चर्चा करते हैं और फिल्म तुरंत घर-घर में मशहूर हो जाती है. यहां तक मीडिया में भी चर्चा में आ जाती है.
साइकोलॉजी में इसे ‘रिवर्स साइकोलॉजी’ कहते हैं. ‘द केरल स्टोरी’ या ‘पद्मावत’ जैसी फिल्मों की बॉक्स ऑफिस सफलता इस बात का सबूत है कि जितना ज्यादा विरोध हुआ, उतने ही ज्यादा लोग थिएटर में उमड़े. फिल्ममेकर अक्सर जानबूझकर ऐसे एलिमेंट्स (टाइटल, कॉस्ट्यूम या डायलॉग) शामिल करते हैं, जिनके बारे में उन्हें पता होता है कि समाज का एक तबका उन्हें चैलेंज करेगा.
‘घूसखोर पंडत’: क्या टाइटल सिर्फ एक इत्तेफाक है?
नीरज पांडे जैसे अनुभवी फिल्ममेकर अपने डिटेल पर ध्यान देने के लिए जाने जाते हैं. जब वे अपनी फिल्म का नाम ‘घूसखोर पंडत’ रखते हैं, तो यह मानना मुश्किल है कि उन्हें इसके संभावित नतीजों के बारे में पता नहीं था. फिल्ममेकर जानते हैं कि भारत में जाति और धर्म सबसे संवेदनशील टॉपिक हैं. इन पर बात करने से हेडलाइन बनना तय है. जो बड़े विज्ञापन होर्डिंग हासिल नहीं कर पाते, वह एक ‘लीगल नोटिस’ या ‘सोशल मीडिया ट्रेंड’ कर देता है.
ओटीटी प्लेटफॉर्म के लिए विवाद एक दोधारी तलवार है. एक तरफ, उन्हें कानूनी दिक्कतों का डर रहता है और दूसरी तरफ विवाद से उनकी व्यूअरशिप कई गुना बढ़ जाती है. जब ‘घूसखोर पंडत’ जैसी फिल्में स्ट्रीम होती हैं तो विवाद के कारण लोग इसे रिलीज के पहले ही दिन देखना चाहते हैं ताकि वे अपनी राय बना सकें. यह उछाल ओटीटी प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम को बढ़ावा देता है.
कला के साथ छेड़छाड़?
इस मार्केटिंग फॉर्मूले का सबसे काला पहलू यह है कि ‘सिनेमैटिक कला’ पीछे चली जाती है. जब कोई फिल्म सिर्फ अपने विवाद के आधार पर बेची जाती है तो फिल्ममेकर अक्सर कंटेंट की क्वालिटी पर कम ध्यान देते हैं. वे जानते हैं कि फिल्म अच्छी हो या बुरी, लोग ‘विवाद’ देखने जरूर आएंगे.
दर्शकों की जिम्मेदारी
दर्शकों के तौर पर, हमें यह समझने की जरूरत है कि हम किस तरह के कंटेंट को बढ़ावा दे रहे हैं. क्या हम सच में किसी फिल्म की कहानी में दिलचस्पी रखते हैं, या हम सिर्फ उस ‘शोर’ का हिस्सा बन रहे हैं जो फिल्ममेकर ने हमारे लिए डिजाइन किया है? इसमें कोई शक नहीं कि आज फिल्म प्रमोशन के लिए विवाद सबसे असरदार और सस्ता तरीका बन गया है. ‘घुसखोर पंडत’ इस ट्रेंड की आखिरी फिल्म नहीं होगी. जब तक विवादों से व्यूअरशिप और पैसा मिलता रहेगा, फिल्ममेकर ऐसी चीजों पर काम करते रहेंगे. वैसे, मेरे विचार से यह एक खतरनाक ट्रेंड है, क्योंकि अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में असली टैलेंट और अच्छी कहानियां इस ‘शोर’ में दब जाएंगी.
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