साल 2012 में आई सुजॉय घोष की ‘कहानी’ ने संस्पेंस थ्रिलर फिल्मों को नई दिशा दी. कम बजट बनी विद्या बालन स्टारर यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई थी. आज भी हिंदी सिनेमा में कहानी कहने के तरीके को प्रभावित कर रही है. इस फिल्म को कसी हुई सस्पेंस कहानियों में दर्शकों की रुचि फिर से जगाने का श्रेय दिया गया. फिल्म की कमर्शियल सक्सेस और आलोचकों की सराहना ने एक नया मोड़ दिया, जिससे फिल्ममेकर्स को मजबूत कहानी के साथ महिला प्रधान थ्रिलर बनाने के लिए प्रोत्साहन मिला.
विद्या बालन की ‘कहानी’ तीन साल बाद यानी 2015 में एक शॉर्ट फिल्म रिलीज हुई. रामायण की एक पौराणिक कथा से इंस्पायर यह माइथोलॉजिकल फिल्म साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म है. इसमें फेमिनिज्म को मॉडर्न तरीके से दिखाया गया है. कहानी के डायरेक्टर ने ही इस 14 मिनट की साइकोलॉजिकल थ्रिलर को बनाया.

इस फिल्म का नाम ‘अहल्या’ है. यूट्यूब पर रिलीज हुई शॉर्ट फिल्म आपको आपको बांधे रखती है. इसे यूट्यूब पर 2.2 करोड़ से ज्यादा बार देखा जा चुका है, जिससे यह ऑनलाइन सबसे ज्यादा देखी जाने वाली भारतीय शॉर्ट फिल्मों में से एक बन गई है. सुजॉय घोष के निर्देशन में बनी इस फिल्म में राधिका आप्टे ने अहल्या की मुख्य भूमिका निभाई है, जबकि दिग्गज एक्टर सौमित्र चटर्जी गौतम साधु और टोटा रॉय चौधरी इंद्र सेन के किरदार में हैं.

‘अहल्या’ की कहानी एक बुजुर्ग कलाकार के घर के भीतर शुरू होती है, जहां एक पुलिस अफसर इंद्र, अर्जुन नाम के लापता व्यक्ति की तलाश में पहुंचता है. दरवाजा खोलते ही अफसर का सामना गौतम की युवा और बेहद खूबसूरत पत्नी अहल्या से होता है, जिसे वह शुरुआत में कलाकार की बेटी समझ लेता है. जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, अफसर अहल्या की मौजूदगी से और ज्यादा अट्रैक्ट होता जाता है.
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घर के अंदर, इंस्पेक्टर को शेल्फ पर कई गुड़िया नजर आती हैं. उनमें से एक गुड़िया लापता व्यक्ति अर्जुन से हूबहू मिलती-जुलती है, जिससे अफसर गौतम से और गहराई से सवाल करने लगता है. इसी दौरान अहल्या चुपचाप ऊपर चली जाती है, जिससे माहौल में बेचैनी और बढ़ जाती है. इसके बाद कहानी में एक मिस्टिरियस एलिमेंट आता है—एक जादुई पत्थर.

गौतम दावा करता है कि जो भी उसे छूता है, वह जो चाहे उसमें बदल सकता है. अफसर इस कहानी को बहाना मानता है, लेकिन गौतम उसे आजमाने के लिए कहता है. पत्थर छूने के बाद अफसर ऊपर अहल्या से मिलने जाता है. जब वह आईने में देखता है, तो उसे अपने चेहरे की जगह गौतम का चेहरा नजर आता है. कुछ ही पलों में, जैसे ही वह अहल्या की ओर बढ़ता है, वह भी एक गुड़िया में बदल जाता है और घर में सजी बाकी गुड़ियों के साथ शामिल हो जाता है.

अपने चौंकाने वाले क्लाइमेक्स के जरिए फिल्म पारंपरिक कथा पर सवाल उठाती है, जिसमें अहल्या को पत्थर बना दिया जाता है. इसके बजाय, कहानी का परिणाम उन लोगों पर डाल दिया जाता है, जिनकी नीयत डगमगाती है, यह दिखाते हुए कि देखने वाले की इच्छा और कमजोरी ही उसकी बर्बादी का कारण बनती है. आखिरी सीन में, घर में एक और मेहमान आता है और मेज से एक मूर्ति गिरने से संकेत मिलता है कि यह चक्र आगे भी चलता रहेगा.

राधिका आप्टे की अहल्या के रूप में अदाकारी को उसकी गहराई और सादगी के लिए खूब सराहा गया. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उन्हें यह किरदार इसलिए पसंद आया क्योंकि इसमें एक साधारण लेकिन ताकतवर आकर्षण दिखाया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि भले ही किरदार अपनी खूबसूरती से ध्यान खींचता है, लेकिन उसके भीतर मासूमियत और सादगी भी है, जो उसकी मौजूदगी को खास बनाती है.

राधिका आप्टे की इस शॉर्ट फिल्म के आईएमडीबी रेटिंग 7.9 है. इस फिल्म को आप यूट्यूब और प्राइम पर देख सकते हैं. 14 मिनट की यह माइथोलॉजिकल फिल्म आपको सोचने पर मजबूर कर देगी.
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