हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर में कई हिंदी फिल्मों की कहानी ‘कुंभ मेले’ के बिना अधूरी रहती थीं. यह हिंदी सिनेमा का पॉपुलर जॉनर बन गया था. हिंदी सिनेमा में मेलों पर बनी ‘यादों की बारात’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘धर्मात्मा’ जैसी फिल्में सुपरहिट हुई थीं.
‘कुंभ मेले’ के थीम पर कई फिल्में बनी हैं, जिनमें से कुछ काफी सफल रहीं. साल 1973 में आई ‘यादों की बारात’ फिल्म मेले में बिछड़ने के थीम की सबसे सफल फिल्म मानी जाती है, जहां तीन भाई एक धुन के जरिए सालों बाद मिलते हैं. अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना और ऋषि कपूर स्टारर फिल्म ‘अमर अकबर एंथनी’ इस कॉन्सेप्ट पर बनी दूसरी बड़ी सफल मूवी है, जो 1977 में रिलीज हुई थी. यहां मनमोहन देसाई ने मेले के सीन को परिवार के दोबारा मिलने के लिए इस्तेमाल किया, जिसने इस फॉर्मूले को अमर बना दिया. प्रकाश झा जैसे निर्देशकों ने अपनी डॉक्यूमेंट्री और फिल्मों में कुंभ को ‘मोक्ष’ और ‘मानवीय आस्था’ के एक विशाल समुद्र के रूप में दिखाया है.
क्यों खास था फिल्मों के लिए कुंभ मेला?
‘कुंभ के मेले’, ‘अधिकार’, ‘कुंभ की कसम’ और ‘धर्मात्मा’ जैसी फिल्मों में मेले को बड़ी खूबसूरती से दिखाया और बयां किया गया है. निर्देशकों ने मेले को हिंदी फिल्मों में ज्यादा तवज्जो क्यों दी, इसकी कुछ वजहें हैं.कुंभ की विशालकाय भीड़ निर्देशकों को प्राकृतिक रूप से वह तनाव और व्याकुलता पैदा करने में मदद करती थी, जो किसी किरदार के खोने के लिए जरूरी है. यह सांस्कृतिक प्रतीक है. मेले में साधु-संतों, अखाड़ों और शाही स्नान के सीन फिल्म को एक भव्य भारतीय लुक देते थे. भारतीय दर्शकों के लिए कुंभ का मतलब केवल नहाना नहीं, बल्कि शुद्धिकरण और नए जीवन की शुरुआत है, जिसे फिल्मों ने ‘बिछड़ने और मिलने’ के जरिये भुनाया. अब सिनेमा थोड़ा बदल गया है. अब केवल ‘बिछड़ने-मिलने’ की कहानियां नहीं, बल्कि ‘मसान’ जैसी फिल्मों में मेलों को जीवन की सच्चाई और मृत्यु के बीच के पड़ाव के रूप में दिखाया जाता है.
About the Author

अभिषेक नागर News 18 Digital में Senior Sub Editor के पद पर काम कर रहे हैं. वे News 18 Digital की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. वे बीते 6 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे News 18 Digital से पहल…और पढ़ें
Discover more from Bollywood News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.