रंगों से भरी टंकी में हर किसी को लगानी पड़ती थी डुबकी
आरके स्टूडियो की होली में रंगों से भरी टंकी बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता. स्टूडियो में रंगों से भरा एक बड़ा सा टब बनाया जाता था. परंपरा यह थी कि जो भी कलाकार या मेहमान आता, उसे सीधे उस टब में डुबकी लगवानी पड़ती थी. आरके स्टूडियो में होली में शालीनता भी थी और जबरदस्त मस्ती भी. वहां कोई बच नहीं सकता था. अगर कोई एक बार अंदर गया तो समझो रंगों से सराबोर होकर ही बाहर निकलता था. माहौल इतना अपनापन भरा होता था कि बड़े-बड़े स्टार्स भी जमीन पर बैठकर खाना खाते और ढोलक की थाप पर नाचते थे.
खाने-पीने का होता था शाही इंतजाम
इस पार्टी में खाने-पीने का शाही इंतजाम होता था. ठंडाई और भांग के साथ-साथ संगीत का ऐसा दौर चलता था कि शाम कब हो जाती, पता ही नहीं चलता. अमिताभ बच्चन, दिलीप कुमार, देव आनंद से लेकर हेमा मालिनी और रेखा तक, हर कोई यहां हाजिरी लगाना अपनी खुशनसीबी समझता था. सितारे सफेद कपड़ों में आते और कुछ ही मिनटों में पहचान में नहीं आते थे.
धीरे-धीरे फीकी पड़ गई होली की चमक
साल 1988 में राज कपूर के निधन के बाद इस परंपरा की चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी, हालांकि उनके बेटों रणधीर, ऋषि और राजीव कपूर ने कुछ सालों तक इसे जारी रखा, लेकिन राज कपूर जैसा जादू कहीं खो गया. आज बॉलीवुड में होली का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है.
क्यों अब वैसी होली नहीं दिखती?
अब वैसी ओपन हाउस पार्टियां नहीं होतीं. आज के दौर में पैपराजी और सोशल मीडिया के चलते सितारे अपनी प्राइवेसी को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं. अब पार्टियां ब्रांड एंडोर्समेंट और पीआर एक्टिविटी का हिस्सा बन गई हैं, जिनमें वो पुराना अपनापन नजर नहीं आता. 2019 में आरके स्टूडियो के बिक जाने के बाद, उस ऐतिहासिक जमीन पर होली की यादें हमेशा के लिए दफन हो गईं.
पूरी फिल्म इंडस्ट्री को एक सूत्र में बांधती थी होली
आज भी जब होली आती है, तो पुराने कलाकार उस दौर को याद कर भावुक हो जाते हैं. राज कपूर की वो होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं थी, बल्कि वो पूरी फिल्म इंडस्ट्री को एक सूत्र में बांधने का जरिया थी. आज भी चेंबूर की गलियों में उस ढोलक की गूंज और शोमैन की वो हंसी याद की जाती है.
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