फिल्म ‘एनिमल’ में रणबीर कपूर का किरदार (रणविजय) मोरैलिटी की सारी हदें पार कर देता है, फिर भी युवाओं ने उसे ‘अल्फा मेल’ मान लिया. ‘KGF’ में यश (रॉकी भाई) कोई बचाने वाला नहीं, बल्कि एक क्रिमिनल है, फिर भी दर्शक उसके साथ खड़े रहे क्योंकि उसने अपनी शर्तों पर जिंदगी जी. आज के समय में विलेन को हीरो से ज्यादा स्टाइलिश और पावरफुल दिखाया जा रहा है. ‘पद्मावत’ में रणवीर सिंह का अलाउद्दीन खिलजी का बेरहम किरदार इतना शानदार था कि हीरो (शाहिद कपूर) उसके सामने फीके पड़ गए. खिलजी का वाइल्ड स्टाइल और ‘खली बली’ डांस एक कल्ट बन गया.
इसी तरह, ‘पठान’ में, जॉन अब्राहम (जिम) ने एक ऐसे विलेन का रोल किया जिसका सेंस ऑफ ह्यूमर अनोखा था और स्टाइल शाहरुख खान जैसा था. जब कोई विलेन इतना ‘हॉट’ और ‘कूल’ हो तो दर्शक नैतिकता भूल जाते हैं.
बॉबी देओल और संजय दत्त
हाल के सालों में कुछ एक्टर्स ने विलेन के तौर पर अपने करियर को फिर से जिंदा किया है. बॉबी देओल ने ‘एनिमल’ में ‘अबरार’ के अपने रोल से सनसनी मचा दी थी. सिर्फ 15 मिनट के रोल में और बिना एक भी शब्द बोले, उन्होंने अपनी बॉडी लैंग्वेज और ‘जमाल कुडू’ डांस से सबका दिल जीत लिया. वहीं, संजय दत्त ने ‘अग्निपथ’ में ‘कांचा चीना’ और ‘KGF 2’ में ‘अधीरा’ के रोल में यह साबित कर दिया कि एक खतरनाक विलेन ही किसी फिल्म को लार्जर दैन लाइफ बनाता है. ऑडियंस अब हीरो की जीत से ज्यादा विलेन के ‘टेरर’ को एन्जॉय करती है.
विलेन की ‘बैकस्टोरी’
आज के फिल्ममेकर विलेन को सिर्फ ‘बुरा’ ही नहीं, बल्कि ‘विक्टिम’ के तौर पर भी दिखाते हैं. ऋतिक रोशन (वेधा) ‘विक्रम वेधा’ में एक गैंगस्टर हैं, लेकिन जब वह अपनी कहानियां सुनाते हैं, तो ऑडियंस उनके क्राइम को भूलकर उनके दर्द से जुड़ जाती है. ऋतिक का चार्म और इंटेलिजेंस ऑडियंस को सोचने पर मजबूर कर देता है, ‘शायद यह गलत नहीं है.’ आज का जमाना पूरी तरह ‘पावर’ का है. हीरो अक्सर मजबूरियों में बंधा होता है, जबकि विलेन आजाद होता है. जैसे- ‘पुष्पा’ में अल्लू अर्जुन का किरदार चंदन की तस्करी करता है. वह गलत है, लेकिन उसकी लाइन- ‘मैं नहीं झुकूंगा’ आम आदमी की सिस्टम के सामने सरेंडर करने की इच्छा को दिखाती है. यहां, ‘पुष्पा’ विलेन नहीं, बल्कि एक बागी बन जाता है.
क्या यह बदलाव खतरनाक है?
जब हमने शाहरुख खान को ‘डर’ या ‘बाजीगर’ में विलेन का रोल करते देखा, तो हमें डर लगा. लेकिन आज, जब स्टार्स विलेन का रोल करते हैं, तो हम उन्हें ‘कूल’ मानते हैं. ‘हीरो’ का दौर भले ही खत्म न हुआ हो, लेकिन दोबारा अपनी पहचान बनाने के लिए, उसे अपनी नैतिकता के साथ-साथ और ग्रे शेड अपनाना होगा.
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