संजय लीला भंसाली का सिनेमा भव्यता के साथ-साथ स्त्री शक्ति का उत्सव है. उन्होंने रानियों के राजसी स्वाभिमान से लेकर समाज से लड़ने वाली बागियों के हौसले तक, पर्दे पर नारी के 7 बेमिसाल रूप पेश किए हैं. चाहे ‘पद्मावत’ की रानी पद्मावती का बलिदान हो या ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ का संघर्ष, उनके हर किरदार ने पितृसत्ता को चुनौती दी है. ये 7 महिलाएं केवल कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि साहस की वो मिसालें हैं, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में नायिका की परिभाषा ही बदल दी.
नई दिल्ली. आज पूरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है, जो महिलाओं के सम्मान और उनकी उपलब्धियों को समर्पित है. हिंदी सिनेमा के सफर में महिलाओं ने अपनी पहचान बनाने के लिए एक लंबा और कड़ा संघर्ष किया है. एक दौर था जब फिल्मों में महिलाओं को केवल ग्लैमर या सपोर्टिंग किरदारों तक सीमित रखा जाता था, लेकिन धीरे-धीरे कुछ डायरेक्टर्स ने इस सोच को बदला.

इस बदलाव में फिल्ममेकर संजय लीला भंसाली का योगदान बेहद खास है. उनकी फिल्में इस बात का जीता-जागती मिसाल हैं कि महिला किरदारों को कहानी के केंद्र में रखकर कैसे भव्य और यादगार सिनेमा बनाया जा सकता है. भंसाली ने अपनी लगभग हर फिल्म में नारी शक्ति को सशक्त और प्रभावशाली रूप में पेश किया है. (फोटो साभार: IMDb)

पारो: ‘देवदास’ में पारो सम्मान और शांत सहनशक्ति का प्रतीक है. दिल टूटने और समाज की उम्मीदों के बावजूद वह कभी भी अपने आत्म-सम्मान से समझौता नहीं करती. पारो का सफर एक ऐसी महिला की ताकत को दिखाता है जो प्यार तो गहराई से करती है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में अपनी पहचान खोने से इनकार कर देती है. (फोटो साभार: IMDb)
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चंद्रमुखी: ‘देवदास’ में ही चंद्रमुखी अपने पेशे से जुड़ी रूढ़ियों को चुनौती देती है. अपनी दयालुता, सहानुभूति और भावनात्मक साहस के जरिए वह कहानी के सबसे यादगार किरदारों में से एक बन जाती है. उसका प्यार निस्वार्थ है और उसकी गरिमा उस नजरिए को बदल देती है जिससे समाज अक्सर हाशिए पर रहने वाली महिलाओं को देखता है. (फोटो साभार: IMDb)

लीला: ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला’ में लीला का किरदार बहुत ही जोशीला, साहसी और पूरी तरह स्वतंत्र है. वह खानदानी दुश्मनी या पुरानी परंपराओं के आगे झुकने से इनकार कर देती है और अपने दिल की सुनती है. लीला एक ऐसी महिला का चेहरा है जो अपनी बात खुलकर कहती है और अपने फैसलों पर अडिग रहती है, चाहे उसका अंजाम कुछ भी हो. (फोटो साभार: IMDb)

मस्तानी: ‘बाजीराव मस्तानी’ में मस्तानी को ताकत और अटूट विश्वास वाली महिला के रूप में दिखाया गया है. एक कुशल योद्धा और समर्पित साथी होने के नाते, वह समाज के विरोध और भेदभाव का सामना गजब के साहस के साथ करती है. मस्तानी का किरदार उसकी संवेदनशीलता और उग्र दृढ़ संकल्प के बीच एक खूबसूरत संतुलन बनाता है. (फोटो साभार: IMDb)

काशीबाई: ‘बाजीराव मस्तानी’ की ही काशीबाई भावनात्मक मजबूती की मिसाल है. निजी तौर पर दिल टूटने के बावजूद, वह अपनी गरिमा, शालीनता और ताकत को बनाए रखती है. उसका किरदार हमें याद दिलाता है कि खामोशी से सब कुछ सहना भी विद्रोह जितना ही ताकतवर हो सकता है. (फोटो साभार: IMDb)

रानी पद्मावती: ‘पद्मावत’ में पद्मावती शाही ताकत और कभी न डगमगाने वाले साहस का प्रतीक हैं. एक रानी के रूप में वह बुद्धिमानी और दृढ़ संकल्प के साथ नेतृत्व करती हैं और बड़े से बड़े खतरे के सामने भी अपने सम्मान, अपनी प्रजा की रक्षा करती हैं. उनका किरदार उस लीडरशिप को दिखाता है जो अटूट विश्वास और बहादुरी पर टिकी है. (फोटो साभार: IMDb)

गंगूबाई: ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ में गंगूबाई का सफर बदलाव और सशक्तिकरण की एक मिसाल है. धोखे और शोषण से उबरकर वह अपने समाज के भीतर सम्मान और अधिकारों की वकालत करने वाली एक दमदार आवाज बनती है. उसकी कहानी विपरीत हालातों में भी डटे रहने और अपनी जिंदगी की कहानी खुद लिखने की ताकत का सबूत है. (फोटो साभार: IMDb)
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