एक समय था जब थिएटर में किसी फिल्म के चलने को उसका अंत माना जाता था, लेकिन 2025 और 2026 की शुरुआत ने यह साबित कर दिया है कि सिनेमा में ‘अंत’ जैसी कोई चीज नहीं होती. आज बॉलीवुड एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां ‘नॉस्टैल्जिया’ सबसे बड़ा प्रोडक्ट बन गया है.
क्या इसमें रिस्क कम और रिटर्न ज्यादा है?
आज एक नई फिल्म बनाने के लिए कम से कम 50 से 100 करोड़ रुपये का इन्वेस्टमेंट चाहिए. इसके अलावा सितारों की डिमांड, भारी मार्केटिंग खर्च और सबसे बड़ा रिस्क- कि फिल्म दर्शकों को पसंद आएगी या नहीं. इसके उलट, री-रिलीज का गणित बहुत आसान है. फिल्म पहले से बनी हुई है, दर्शक उसे पसंद करते हैं और गाने पहले से ही हिट हैं. मेकर्स को सिर्फ ‘डिजिटल रेस्टोरेशन’ (4K क्वालिटी) और सीमित मार्केटिंग पर थोड़ा खर्च करना होता है. जब 5 फरवरी, 2016 को रिलीज हुई ‘सनम तेरी कसम’ को री-रिलीज किया गया तो इसने साबित कर दिया कि अगर सही समय पर वापस लाया जाए तो एक ‘फ्लॉप’ फिल्म भी करोड़ों कमा सकती है.
री-रिलीज के लिए टारगेट ऑडियंस कौन है?
इस साल के वैलेंटाइन सीजन ने री-रिलीज के ट्रेंड को एक नए लेवल पर पहुंचा दिया है. 6 फरवरी को ‘देवदास’ की रिलीज उन लोगों के लिए एक तोहफा है जिन्होंने यह शानदार फिल्म बड़े पर्दे पर कभी नहीं देखी. 13 फरवरी को ‘ये दिल आशिकाना’ जैसी फिल्मों को वापस लाना 90 के दशक के बच्चों को टारगेट करता है जिनके पास अब पैसे हैं और वे अपनी टीनएज की यादों को फिर से जीना चाहते हैं. 27 फरवरी को ‘तेरे नाम’ की रिलीज दिखाती है कि सलमान खान के ‘राधे’ कैरेक्टर का क्रेज अभी भी जिंदा है.
इस पूरे ट्रेंड के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा ‘सनम तेरी कसम’ रही है. जब यह 2016 में रिलीज हुई थी, तो किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया था, लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फिल्म को मिली ‘कल्ट’ फॉलोइंग ने मेकर्स को यकीन दिलाया कि फिल्म फ्लॉप नहीं थी, बल्कि गलत समय पर रिलीज हुई थी. जब इसे सिनेमाघरों में वापस लाया गया तो युवाओं की भीड़ ने साबित कर दिया कि वे अभी भी ‘इंदर और सरू’ के प्यार के लिए रोने को तैयार हैं. यह बॉलीवुड के इतिहास में सबसे बड़ा ‘मास्टरस्ट्रोक’ साबित हुआ.
दर्शक पुरानी फिल्मों की ओर क्यों लौट रहे हैं?
आज की नई फिल्मों में अक्सर ‘आत्मा’ की कमी होती है. दर्शक भारी VFX और बेतुकी स्क्रिप्ट से थक चुके हैं. पुराने गानों में जो धुन थी, वह आज के ‘रीमिक्स’ के दौर में गायब है. 90 के दशक और 2000 के दशक की शुरुआत की कहानियों में परिवार और भावनाओं पर जोर दिया गया था, जो डिजिटल युग के आज के युवाओं से जुड़ता है. घर पर OTT पर फिल्म देखना और सैकड़ों लोगों के साथ सिनेमा हॉल में बैठकर ताली बजाना- ये दो बिल्कुल अलग अनुभव हैं. री-रिलीज दर्शकों को वह सामूहिक अनुभव वापस दे रही हैं.
क्या हैं चुनौतियां और अवसर?
क्या यह री-रिलीज का ट्रेंड नई फिल्मों के लिए खतरा है? शायद नहीं. यह एक चेतावनी है. यह बॉलीवुड को बता रहा है कि अगर आप अच्छी कहानियां नहीं बनाएंगे, तो दर्शक पुरानी फिल्मों से ही खुश हैं. वैसे, बॉलीवुड ने सच में एक ऐसा रास्ता ढूंढ लिया है जहां रिस्क कम है और प्यार ज्यादा है.
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