Bollywood Movies with Same Story : एक ही कहानी को चार बार दर्शकों के सामने पेश किया. चारों ही फिल्में एक ही साल में रिलीज हुईं. संयोग देखिए कि चारों ही फिल्में सुपरहिट रहीं. चारों फिल्मों में डायरेक्टर ने बड़ी मेहनत की. फिल्म में ऐसे सीन रखे कि दर्शक अपनी सीटों से हिल भी ना सके. मजेदार बात यह है कि चारों ही फिल्मों का डायरेक्टर एक ही था. चारों फिल्मों का लास्ट सीन एक जैसा था. ऐसा कारनामा वर्षों में एक बार होता है. बॉलीवुड के इतिहास में इस डायरेक्टर के नाम कई रिकॉर्ड दर्ज हैं. उन्होंने जो सफलता अर्जित की, शायद ही किसी को मिले. ये फिल्में कौन सी थीं, आइये जानते हैं……
एक साल में एक ही स्टोरी को चार फिल्मों में दिखाया जाए और दर्शक स्क्रीन से नजरें भी ना हटा पाएं तो इसे क्या कहा जाएगा. डायरेक्टर ने चारों फिल्मों में ऐसे सीन रखे कि दर्शक कहानी से बंध गए. एक मिनट के लिए पलकें भी ना झपका सके. इस तरह का कारनामा 70 के दशक में डायरेक्टर मनमोहन देसाई ने किया था. उनकी 1977 में एक ही साल में चार फिल्में आई थीं. चारों फिल्मों की कहानी सेम ट्रैक पर थी. चारों ही फिल्में सुपरहिट रहीं, बस हीरो बदलते रहे. दो फिल्मों में जहां अमिताभ-विनोद खन्ना थे तो दो फिल्मों में धर्मेंद्र ने अपनी अदाकारी के जलवे बिखेरे थे. ये फिल्में थीं : धरम वीर, चाचा भतीजा, परवरिश और अमर अकबर एंथोनी. आइये जानते हैं चारों फिल्मों की कहानी और इनसे जुड़े दिलचस्प फैक्ट्स….

सबसे पहले बात करते हैं 11 जनवरी 1977 को रिलीज हुई चाचा भतीजा फिल्म की जिसका निर्देशन मनमोहन देसाई ने किया था. यह एक एक्शन कॉमेडी फिल्म थी जिसे सलीम-जावेद की जोड़ी ने लिखा था. फिल्म में धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, रणधीर कपूर, योगिता बाली, जीवन, रहमान, इंद्राणी मुखर्जी और सोनिया साहनी नजर आई थीं. फिल्म दर्शकों को खूब पसंद आई थी. म्यूजिक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का था. गीतकार आनंद बख्शी थे.

फिल्म का एक गाना ‘क्यों भाई चाचा क्यों भतीजा’ पॉप्युलर हुआ था. मूवी ने 3 करोड़ रुपयों की कमाई की थी. यह उस साल की पांचवी सबसे ज्यादा पैसे कमाने वाली फिल्म थी. चाचा-भतीजा फिल्म में एक परिवार के टूटने और फिर एकजुट होने की कहानी दिखाई गई थी. फिल्म में मनमोहन देसाई ने ‘खोया-पाया’ का फॉर्मूला अपनाया था. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक बड़ी हिट साबित हुई थी.
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मनमोहन देसाई किस्सागोई में बहुत माहिर थे. उनके पास चुनिंदा लेखकों की टीम थी. विषय और कहानी भले ही एक जैसी हो, उसे प्रस्तुत करने के अंदाज पर उनका फोकस रहता था. प्रस्तुति ऐसी रते थे कि दर्शक एक सेकंड के लिए भी अपनी तरफ से कुछ सोच ना सके. ‘खोया-पाया’ फॉर्मूले पर ही उनकी एक और फिल्म 27 मई 1977 को रिलीज हुई थी जो कि उस साल की दूसरी सबसे ज्यदा कमाई करने वाली फिल्म बनी. डायरेक्टर-प्रोड्यूसर भी मनमोहन देसाई ही थे. मूवी का नाम अमर अकबर एंथोनी था. यह एक मसाला फिल्म थी जिसमें एक्शन, ट्रेजडी, कॉमेडी, अंधविश्वास, पुनर्मिलन हर एलिमेंट था. कहानी प्रयागराज की थी जबकि म्यूजिक लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने कंपोज किया था. फिल्म का हर गाना सुपरहिट रहा. आज इनकी गिनती कल्ट क्लासिक में होती है.

अमर अकबर एंथोनी में विनोद खन्ना, ऋषि कपूर, अमिताभ बच्चन, नीतू सिंह, परवीन बॉबी, शबाना आजमी जैसे लीड सितारे नजर आए थे. यही वो साल था जब अमिताभ बच्चन के स्टारडम को विनोद खन्ना टक्कर दे रहे थे. फिल्म की कहानी का आइडिया अखबर में छपी तीन लावारिस बच्चों की स्टोरी के आधार पर आया था. फिर मनमोहन देसाई ने राइटर प्रयागराज के साथ मिलकार कहानी तैयार की थी. फिल्म की कहानी में तीनों भाई अलग-अलग धर्म में पलते-बढ़ते हैं और फिल्म के अंत में तीनों का मिलन होता है. 1.2 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने 15 करोड़ के करीब वर्ल्डवाइड कलेक्शन किया था.

मनमोहन देसाई ने एक बार फिर से ‘खोया-पाया’ फॉर्मूले पर एक स्टोरी का ताना-बाना अपनी राइटर्स टीम के साथ बुना. फॉर्मूले को रिपीट करते हुए उनकी एक फिल्म 6 सितंबर 1977 को ‘धरम-वीर’ रिलीज हुई. धरम-वीर में एक तरफ जहां धर्मेंद्र-जीनत अमान की जोड़ी थी तो दूसरी ओर जीतेंद्र-नीतू सिंह पेयर में नजर आए. प्राण-जीवन और रंजीत भी अहम भूमिकाओं में थे. लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का म्यूजिक और आनंद बख्शी-विट्ठलभाई पटेल के गीतों ने धूम मचा दी थी. मनमोहन देसाई ने अपने एक इंटरव्यू में दावा किया था कि उन्हें महाभारत के पात्र कर्ण से लगाव था. इसी पात्र से इंस्पायर्ड होकर उन्होंने धरम-वीर की कहानी लिखवाई थी. धरम-वीर 1977 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाले फिल्म थी.

मनमोहन देसाई सिर्फ इमोशंस पर जोर देते थे. वो किसी लॉजिक को नहीं मानते थे. उन्होंने कई बार बिना लॉजिक के सीन फिल्मों में डाले हैं. हीरो भले ही उन्हें गलत कहता रहा लेकिन उन्होंने सबको गलत साबित कर दिया. फिल्म की कहानी कहने के लिए तो ऐतिहासिक थी लेकिन किसी विशेष कालखंड में घटित नहीं हुई. फिल्म में समुराई तलवारबाजी भारतीय दर्शकों के लिए नया प्रयोग था. फिल्म के एक्टर-एक्ट्रेस तरह के ड्रेस में नजर आए. धर्मेंद्र की ड्रेस तो बिल्कुल ही अलग थी. उन्हें गबरू जवान की तरह पेश किया गया. धरम-वीर में भी फिल्म के क्लाइमैक्स में बिछड़ा हुआ परिवार फिर से मिल जाता है. वैसे मनमोहन देसाई ने फिल्म के अंत में धरम के कैरेक्टर को मारना चाहते थे. मनमोहन देसाई के मुताबिक पूरी फिल्म कर्ण के कैरेक्टर पर बेस्ड है.

11 नवंबर 1977 को मनमोहन देसाई की एक और फिल्म ‘परवरिश’ आई जिसमें शम्मी कपूर, विनोद खन्ना, अमिताभ बच्च, नीतू सिंह, शबाना आजमी, कादर खान और अमजद खान लीड रोल में थे. प्रयागराज-केके शुक्ला का स्क्रीनप्ले, कादर खान के डायलॉग ने पर्दे पर दर्शकों को तालियां बजाने के लिए मजबूर कर दिया था. फिल्म में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की धुन से सजे गाने थे. फिल्म की कहानी अमिताभ बच्चन-विनोद खन्ना के इर्द-गिर्द घूमती है. दोनों भाई थे. एक पुलिस ऑफिसर तो दूसरा जुर्म की दुनिया का चतुर खिलाड़ी था. विनोद खन्ना का किरदार निगेटिव था.

1.66 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने 6.5 करोड़ का वर्ल्डवाइड कलेक्शन किया था. इस मल्टीस्टार फिल्म में अमिताभ-विनोद खन्ना के अलावा शम्मी कपूर, नीतू सिंह और शबाना आजमी ने भी शानदार काम किया था. वैसे विनोद खन्ना का किशन वाला रोल पहले राजेश खन्ना को ऑफर हुआ था. राजेश खन्ना फिल्म में डाकू मंगल सिंह (अमजद खान) के बेटे अमित सिंह का रोल करना चाहते थे जिसे अमिताभ ने निभाया था. यह उस साल की चौथी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म थी. इस तरह से मनमोहन देसाई ने इस साल चार हिट फिल्मों दीं और चारों में एक जैसी कहानी, एक जैसा फॉर्मूला अपनाया.
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