संजय लीला भंसाली की फिल्मों जैसे ‘देवदास’, ‘हीरामंडी’ में भव्य सेट, सशक्त महिला किरदार और कला का मेल दिखता है. इसकी वजह उनकी मां है. संजय ने अपनी मां को कपड़े सिलते हुए देखा है. काम करते हुए देखा है. संजय के लिए उनकी मां बहुत बड़ी हिम्मत बनीं.
फिल्म ‘देवदास’ का एक सीन. (यूट्यूब वीडियोग्रैब)
‘देवदास’ बनाने वाले भंसाली ने सेट पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा दिए थे. मीडिया रिपोर्ट की मानें तो चंद्रमुखी का कोठा और पारो का महल बनाने में 15 करोड़ रुपए का खर्चा हुआ था. इतना ही नहीं, फिल्मों के लिए सिर्फ ऐश्वर्या राय के लिए भंसाली ने 600 साड़ियां डिजाइन करवाई थीं. गौर करने वाली बात यह भी है कि भंसाली की फिल्मों में हमेशा फीमेल लीड को सशक्त दिखाया है, चाहे वे चंद्रमुखी, पारो, लीला या फिर ‘हीरामंडी’ की फरीदन ही क्यों न हों. इसके पीछे भी बहुत बड़ी वजह है.
निर्माता-निर्देशक ने हमेशा अपनी मां को संघर्ष भरी जिंदगी जीते हुए देखा. अपने दोनों बच्चों को पालने के लिए लीला भंसाली कपड़े सिलती थी, साड़ियों पर फॉल लगाती थी और जरूरत पड़ने पर छोटे मंच पर डांस भी करती थी, लेकिन चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी. यह मुस्कान भंसाली की हिम्मत बनी और उन्होंने ठान लिया कि उनकी हर फिल्म में अभिनेत्री बड़े और भव्य मंच पर डांस करेगी और महिलाओं के लिए उनकी फिल्मों और किरदारों में हमेशा वही हिम्मत और मजबूती झलकेगी, जो उन्होंने अपनी मां में देखी थी.
एक इंटरव्यू में फिल्म ‘देवदास’ का जिक्र करते हुए भंसाली ने कहा था कि फिल्म में उन्होंने ऐश्वर्या और माधुरी की मां दुर्गा के रूप में कल्पना की थी और मेरे लिए महिलाओं से बड़ी कोई शक्ति नहीं है. शायद यही वजह रही कि भंसाली की लगभग सभी फिल्मों में मर्दों को भावनात्मक रूप से टूटा हुआ दिखाया गया है, लेकिन महिलाओं को सशक्त और शक्ति का रूप दिखाया गया है. बात चाहे पद्मावती की हो या रामलीला की, दोनों की फिल्मों में फीमेल किरदार का दबदबा ज्यादा रहा है.
वहीं. भंसाली राज कपूर के बहुत बड़े फैन हैं. वे जब भी फिल्में बनाते हैं तो राज कपूर को हमेशा अपने दिमाग में रखते हैं. उनसे प्रभावित होकर ही भंसाली ने फिल्मों का निर्देशन करने का फैसला लिया था.
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रमेश कुमार, सितंबर 2021 से न्यूज 18 हिंदी डिजिटल से जुड़े हैं. इससे पहले एबीपी न्यूज, हिंदीरश (पिंकविला), हरिभूमि, यूनीवार्ता (UNI) और नेशनल दुनिया में काम कर चुके हैं. एंटरटेनमेंट, एजुकेशन और पॉलिटिक्स में रूच…और पढ़ें
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