Jackie Shroff Life Story: यह बॉलीवुड के ‘जग्गू दादा’ की कहानी है, जो सड़कों से उठकर ऐशो-आराम की ऊंचाइयों तक पहुंचे, लेकिन एक गलत फैसले ने उन्हें वापस जमीन पर ला पटका. अक्सर फिल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध और ग्लैमर के पीछे अंधेरी गलियां छिपी होती हैं और जैकी श्रॉफ की जिंदगी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. आज हम आपको उसी टर्निंग पॉइंट के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसने जैकी श्रॉफ को आर्थिक रूप से तोड़कर रख दिया था.
नई दिल्ली. अगर हम जैकी श्रॉफ के करियर में गिरावट और उनके संघर्षों की बात करें तो 2003 में रिलीज हुई फिल्म ‘बूम’ एक टर्निंग पॉइंट थी. यह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि जैकी श्रॉफ और उनकी पत्नी आयशा श्रॉफ का एक बड़ा सपना था, जो एक बुरे सपने में बदल गया था. जैकी श्रॉफ ने यह फिल्म अपने प्रोडक्शन हाउस बैनर के तहत प्रोड्यूस की थी. उस समय के हिसाब से फिल्म का बजट काफी ज्यादा था और इसमें अमिताभ बच्चन जैसे सुपरस्टार के साथ-साथ कैटरीना कैफ (डेब्यू फिल्म) और गुलशन ग्रोवर जैसे कलाकार थे. जैकी ने इस फिल्म के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था. उन्होंने ऊंची ब्याज दरों पर लोन लिया और अपनी सारी सेविंग लगा दी थी.

‘बूम’ के साथ जो हुआ, वह किसी भी प्रोड्यूसर के लिए बहुत ही दर्दनाक जैसा था. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो फिल्म रिलीज से पहले ही पायरेसी का शिकार हो गई. इसके अलावा, फिल्म के बोल्ड कंटेंट को लेकर काफी विवाद हुआ और दर्शकों ने इसे पूरी तरह से नकार दिया. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हो गई. नतीजा ये हुआ कि जैकी श्रॉफ रातों-रात करोड़ों रुपये के कर्ज में डूब गए. लेनदारों ने उनके घर के बाहर लाइन लगा दी.

जैकी श्रॉफ ने खुद कई इंटरव्यू में माना है कि ‘बूम’ की असफलता के बाद उनकी जिंदगी का सबसे मुश्किल दौर शुरू हुआ. कर्ज चुकाने के लिए जैकी को अपना आलीशान घर बेचना पड़ा. हालात इतने खराब हो गए थे कि उन्हें कर्ज चुकाने के लिए घर का फर्नीचर और अपनी पत्नी की कुछ कीमती चीजें भी बेचनी पड़ीं.
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एक आत्म-सम्मान वाले इंसान होने के नाते जैकी श्रॉफ ने भागने के बजाय कर्ज चुकाने का फैसला किया, लेकिन ए-लिस्ट फिल्मों के ऑफर कम हो रहे थे और कर्ज का पहाड़ बहुत बड़ा था. यहीं से उनके करियर में वह दौर शुरू हुआ, जिसे उनके फैंस आज भी दुख के साथ याद करते हैं. पैसे की कमी के कारण, जैकी श्रॉफ को ऐसी फिल्में साइन करनी पड़ीं जो उनकी स्टार वैल्यू के साथ न्याय नहीं करती थीं. उन्होंने साउथ इंडियन फिल्मों में छोटे रोल किए, बहुत कम बजट वाली बी-ग्रेड मसाला फिल्मों में काम किया और यहां तक कि ऐसी फिल्मों में भी काम किया जिनकी स्क्रिप्ट भी तैयार नहीं थी.

‘परिंदा’ और ‘खलनायक’ जैसी फिल्मों में लीड रोल निभाने वाला एक्टर अब फिल्मों में छोटे विलेन या साइड रोल में नजर आने लगा. इस दौरान, उनकी प्राथमिकता ‘कला’ नहीं बल्कि ‘कमाई’ थी. उन्हें हर वह काम करना पड़ा जो उनके रास्ते में आया ताकि वह अपने परिवार का पेट पाल सकें और सिर ऊंचा करके जी सकें.

कहते हैं कि हर काली रात के बाद एक नई सुबह आती है. जैकी श्रॉफ की जिंदगी में यह सुबह उनके बेटे टाइगर श्रॉफ लेकर आए. जैसे ही टाइगर श्रॉफ ने बॉलीवुड में कदम रखा और अपनी पहली फिल्म ‘हीरोपंती’ से सफलता हासिल की, उन्होंने सबसे पहले अपने पिता की खोई हुई इज्जत और सम्मान वापस दिलाया.

टाइगर की कड़ी मेहनत और कमाई से परिवार में खुशियां लौट आईं. आज जैकी श्रॉफ उस दौर से आगे निकल चुके हैं. अब वह सिर्फ वही फिल्में करते हैं जो उन्हें पसंद हैं.’भारत’, ‘राधे’ और ‘जेलर’ जैसी फिल्मों में उनके रोल ने यह साबित कर दिया कि टाइगर के पिता आज भी इंडस्ट्री के असली हीरो हैं.

जैकी ने कभी अपनी गरीबी की शिकायत नहीं की, न ही कभी किसी को धोखा दिया. उन्होंने बी-ग्रेड फिल्मों में काम किया, संघर्ष किया, लेकिन अपनी सादगी और अपनी जड़ों से जुड़ाव कभी नहीं छोड़ा.
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